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Monday, March 2, 2015

बाल विवाह (लघु कथा )

गीता बार बार रो रही थी ,                            
"पिताजी मैं नहीं पहनूँगी ये जोड़ा "
मुझे माँ को बहनो को और आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाना ,
पर बलवंत नहीं माना  ,
चिल्लाते हुए बोला " एक एक कर के हाँथ पीले नहीं करूँगा तो कब तक तुम ४ बहनों को पार लगाउँगा "
चुप - चाप पेहेन ले।
गीता लाख गिडगिडायी पर उसकी एक न चली , जोड़ा पहनते हुए
उसे ये डर भी सताने लगा की जैसा उसके साथ हो रहा है ,
उसकी तीनो बहनों के साथ न हो। बहनों के मासूम चेहरों ने ,
उसमे एक अजब से विश्वाश को पैदा किया
और मंडप मे जाने से पहले गीता ने भगवान के सामने हाँथ जोड़ कर प्रण लिया
"मेरे साथ जो अन्याय हो रहा है वो मैं अपनी बहनों के साथ कभी नहीं होने दूंगी "
अब ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य् है।
इतना कह कर एक दृढ निश्चय के साथ चल पड़ी।

रेवा 

10 comments:

  1. काश की हर नारी जाग उठे ...

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक लघु कथा...

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  3. कुछ शब्दों की शक्ल में एक पूरा भाव , सराहनीय लघु कथा

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  4. chand shabdo main bahut kuchh kah dala....keep writing friend

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  5. बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर आपने बहुत ही सार्थक रचना पेश की है। धन्‍यवाद।

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