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Wednesday, July 22, 2015

बेमानी प्यार





जाने क्यों
पर भटकती रही
सदा प्यार के लिए….

प्यार नज़र भी आया
पर हंसी आई ये जान कर की
प्यार भी सहुलियत के हिसाब से
किया जाता है …

फ्री हैं तो प्यार जाता दिया
मसरूफ हुए तो ठुकरा दिया
उफ्फ्फ !!

जब ज़िन्दगी मे
खालीपन महसूस हुआ
तो याद आया फिर वही प्यार ....

और उस प्यार को वहां न पा कर
बेवफा और न जाने
क्या क्या उपनाम दिया....
वाह !

खुद को सच्चा
और प्यार को बदनाम किया …
हुँह !

"खुद हुए मसरूफ
और बेवफ़ा  मुझे नाम दिया ,
चल दिए दामन छुड़ा कर
और बेमानी मेरा प्यार हुआ  "!!!!!!!

रेवा

21 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बृहस्पतिवार 23 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुती का लिंक 23 - 07 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2045 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. प्यार को कोई भी नाम मिले पर फ़िर भी प्यार तो प्यार ही रहता हैं । जब बदनामी का ड़र हो तो प्यार मत करों ...
    http://savanxxx.blogspot.in

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  4. शायद सहूलियत को प्यार नहीं स्वार्थ जरूर कह सकते हैं ... पर कुछ असलियत भी होती है आज ऐसे प्यार में ...

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  5. बहुत खूब! सुदर भाव

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  6. बेमानी प्यार ........जैसे बेईमानी प्यार में......बहुत कुछ कह दिया आसानी से। सुन्दर

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  7. Bilkul sahi baat..,sundar abhivyakti..

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  8. seema ji blog par apka swagat hai....shukriya

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  9. मन के भाव को शब्दों में लिखा है ... कभी कभी किसी का अहम कोई गरूर ये रिश्ता तोड़ने को प्रेरित करता है

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