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Wednesday, May 3, 2017

बिखरे सपने





टूट कर बिखरे सपने
पड़े हैं एक कोने मे ,                
आज उन्हें
सिसकने की भी
इज़ाज़त नहीं ,
क्यूंकि गलती तो
इनकी ही है ,
क्यों बस गए इन आँखों मे
सतरंगी पंख लगा कर ,
अब तो पंख का
बस एक ही रंग
बचा है स्याह सा ,
उसे भी आज नोच कर
परे कर दिया गया है
और बच गयी है
ये सुनी बेजान आँखें ..........

रेवा





18 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 04 मई 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा.... धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 04-05-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2627 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व हास्य दिवस - अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. बहुत सुन्दर....

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  5. सटीक व सुंदर अभिव्यक्ति !भावनाओं की, आभार।

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  6. जब सपनों का गला घुंटता है तो दर्द रिसता है
    बहुत सुन्दर

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  7. बहुत सुन्दर

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