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Thursday, May 25, 2017

पापा

पापा 

मुझे दर्द बहुत होता है
जब आपकी तस्वीरों
पर माला देखती हूँ 

मुझे दर्द बहुत होता है
जब माँ को तन्हाइयों से
लड़ते देखती हूँ  

मुझे दर्द बहुत होता है
जब  गर्मियों में
बच्चों की छुट्टियां होती हैं
और आपकी आवाज
नहीं आती,

मुझे दर्द बहुत होता है
जब भईया को इस उम्र में
इतना बड़ा बनते देखती हूँ ,

पापा बहुत याद आते हैं आप
जब मुझे ज़िद करने की
इच्छा होती है ,

बहुत रोती हूँ मैं
जब कोई लाड़ से मनुहार
नही करता ,

पापा बहुत दर्द होता है
जब मुझे एक दोस्त चाहिए
होता है समझने
और प्यार करने के लिए ,

पर एक बात की खुशी
हमेशा रहेगी कि भगवान ने
आपको दर्द से सदा के लिए
मुक्त कर दिया ,

इसी आस के साथ मैं भी
ज़िंदा हूँ पापा
कि एक दिन हम फिर मिलेंगे
अनंत से आगे इस दुनिया से दूर
जन्नत में।

रेवा 

23 comments:

  1. Replies
    1. शुक्रिया लोकेश जी

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 26 मई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. मार्मिक प्रस्तुति ,बहुत सुन्दर !आभार। "एकलव्य"

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  4. मर्मस्पर्शी!

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  5. बहुत सुन्दर...

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  6. मर्मस्पर्शी कविता

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  7. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  8. दिनांक 31/05/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
    आप की प्रतीक्षा रहेगी...

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  9. पिता से विछोह का मार्मिक प्रस्तुतीकरण। पिता के स्मरण को ताज़ा करती सुन्दर रचना।

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  10. पिता प्रेम के गहरे एहसास समेटे ... लाजवाब भावपूर्ण रचना ...

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