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Saturday, January 13, 2018

सिन्ड्रेला और बचपन




कल टेलीविज़न पर 
बिटिया सिंड्रेला देख रही थी
तो याद आया मुझे
बचपन में हमने भी पढ़ी थी
सिंड्रेला की कहानी
और खो गए थे सपनों में
ये सोच कर ख़ुश हो गए थे की
हमे भी परी माँ मिलेगी
फिर वो कुछ ऐसा करेंगी की
बिल्कुल सिंड्रेला के
जैसे राजकुमार से
हमारी भी मुलाकात होगी
उसके जैसे अच्छे कपड़े
और कांच के जूते होंगे
हमारे पास ,
पर आजकल हमने
बच्चों को बहुत
तर्कसंगत और व्यवहारिक
बना दिया है
गुड टच बैड टच जैसी
बातों में फंसा दिया है
जो समय की मांग भी है ,
पर बच्चों के सपने
उनकी बचकानी
बातें , ख्वाहिशें
उनसे छीन ली हैं
यहां तक कि वो किसी
अजनबी से बात भी नहीं
कर सकते
क्या पता कौन क्या कर दे ??
दुनिया चाहे बहुत आगे
निकल गयी है
पर हमारे बच्चे और
उनका बचपना
खत्म हो गया है

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-01-2018) को "मकर संक्रंति " (चर्चा अंक-2848) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हर्षोंल्लास के पर्व लोहड़ी और मकर संक्रान्ति की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Replies
    1. This comment has been removed by the author.

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    2. शुक्रिया onkar जी

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  3. निमंत्रण पत्र :
    मंज़िलें और भी हैं ,
    आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद है आपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं।
    ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा ! इसी पावन उद्देश्य के साथ लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी गणमान्य पाठकों व रचनाकारों का हृदय से स्वागत करता है नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' में सोमवार १५ जनवरी २०१८ को आप सभी सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद !"एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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