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Sunday, January 28, 2018

नक़ाब




कितने मसरूफ़ रहते हैं न
लोग आजकल
इतने नक़ाब जो
बदलने पड़ते हैं उन्हें

कभी प्यार का ऐसा नक़ाब
चढ़ा लेते हैं कि लगता है
उनसे ज्यादा हमसे प्यार
कोई कर ही नहीं सकता

पर जब उन्हें लगता है हमें
उनकी आदत हो गयी है
वो बदल का खामोशी का
नक़ाब पहन लेते हैं

हज़ार मिन्नतें और
लाख मनुहार के बाद भी
उनकी खामोशी नही टूटती
बल्कि और मजबूत हो जाती है

लेकिन जब उन्हें लगता है
हम टूट रहे हैं तो
वो एक और नक़ाब लगाते हैं
दया का

उन्हें इस बात का ज़रा भी
इल्म नहीं की उनके इन हरकतों से
हम उनसे बहुत दूर चले जाते हैं
सदा सदा के लिए
और वो रह जातें हैं अकेले अपने
हज़ार नकाबों के साथ !!

रेवा

14 comments:

  1. बहुत सुंदर विवरण

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    1. शुक्रिया Deepak जी

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, फ़ील्ड मार्शल करिअप्पा को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-01-2017) को "है सूरज भयभीत" (चर्चा अंक-2864) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत सही कहा। दुनिया में ऐसे ही लोग ज्यादा हैं।

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  5. जय मां हाटेशवरी....
    हर्ष हो रहा है....आप को ये सूचित करते हुए.....
    दिनांक 30/01/2018 को.....
    आप की रचना का लिंक होगा.....
    पांच लिंकों का आनंद
    पर......
    आप भी यहां सादर आमंत्रित है.....

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    1. आभार कुलदीप जी

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  6. सही कहा आपने रेवा जी, बहुत से नकाबपोश हमारे इर्द गिर्द होते हैं पर हम उन्हें परखने में धोखा खा जाते हैं.

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    1. जी..मेरे blog पर आपका स्वागत है ....शुक्रिया

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  7. अच्छी और सामयिक रचना 👏 👏

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