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Monday, November 12, 2018

चालाक बुनकर



मकड़ी एक चालाक बुनकर है
बुनती रहती है जाल
फंसाती रहती है उस जाले में
कीड़े मकोडों को
जो फंसकर गँवा बैठते हैं
अपनी जान 
वे बेचारे कीडे़ मकोडे़

जो मकड़ी बुनती है जाला
बनाती है फंदा
इतराती है
अपनी बुनकारी पर
जीवन भर,
वो भी एक दिन
इसी जाले के साथ
ख़त्म हो जाती है

मकड़ी की लाश
उसी के जाले में
जगह-जगह विराने में
झूलती रह जाती है
अफ़सोस का एक शब्द भी
किसी ज़बान पर नहीं ठहरता
गुमनामी की हवेली में
मकड़ियों के जाले पर
कोई मातम नहीं करता।


#रेवा 
#जाल 

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-11-2018) को "छठ माँ का उद्घोष" (चर्चा अंक-3154) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन डॉ. सालिम अली - राष्ट्रीय पक्षी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. बहुत सुंदर रचना

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