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Tuesday, January 21, 2020

बुक मार्क








उस रात मैं किताब पढ़ 
रही थी 
एक पन्ने पर आ कर 
ठहर गयी 
आगे बढ़ ही नहीं पाई 
बुक मार्क लगाया और 
सो गई 

उस पन्ने का हर शब्द 
हमारे इश्क़ को 
बयां कर रहा था 
जिसे पढ़ कर 
तुम्हारी याद 
बेतरह आने लगी 
बताओ ज़रा तुम्हारी 
यादों से आगे कैसे बढ़ जाऊँ 
कैसे यादों से भरे उस 
पन्ने को पलट दूं 

वो बुक मार्क लगी किताब 
आज भी उसी तरह 
पड़ी है मेरे साइड टेबल पर 
और तुम्हारी याद वैसे ही 
हमारे मिलने के तारीखों 
के बुक मार्क के साथ मेरे 
दिल पर....

#रेवा

10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (22-01-2020) को   "देश मेरा जान मेरी"   (चर्चा अंक - 3588)    पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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  2. भावपूर्ण ,अत्यंत सुंदर रचना ,सादर

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 22 जनवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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