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Sunday, June 14, 2020

दोपहर





बहुत दिन बाद
आज दोपहर में 
कुछ सुकून के लम्हों से
मुलाकात हुई,
खुद में सिमटी
अधलेटी सी पड़ी थी मैं,
बाहर बरसात अपने
पूरे जोश में 
बरस रही थी,

मेरे पास ही फ़ोन पर
गुलज़ार साहब के
लिखे गाने चल रहे थे,

मेरा मन न जाने क्यों
अजीब सा हो रहा था,
ऐसा जैसे मैं कहीं
डूब रही हूँ

ग़म तो कुछ भी नहीं
फिर भी जाने क्यों ????
समझ ही नहीं आया ....
अनायास ही एक बूँद
मेरे गालों को गीला
कर गयी

और मैं तेरी याद में 
बुरी तरह भीग गयी,
पर जानते हो....
खुद को सुखाने का
बिलकुल मन था,
लग रहा था
बरसात यूँ ही होती रहे
और मैं यूं ही भीगती रहूँ !!!

रेवा







1 comment:

  1. आपके खूबसूरत शब्दों की बारिश ने हमें भी साथ में भिगो दिया ����

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