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Monday, August 20, 2018

मैं स्त्री हूँ





हां मैं स्त्री हूँ
लेकिन कमज़ोर
बिल्कुल नहीं ...
और साथ साथ ये भी बता दूं
मैं भी इंसान हूँ

मुझ में संवेदनाएं हैं 
अपनों से जुड़ी 
परिस्थियाँ मुझे
विचलित करती हैं
और तब मैं भावनाओं 
में बह कर कमज़ोर
पड़ जाती हूँ

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब बात आती है
मेरे बच्चों की
जब बात आती है
उनके भविष्य की

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब मैं चाहती हूं हर
कीमत पर अपने घर की
सुख और शांति

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब देखती हूँ
पति का चिंतित लटका
हुआ चेहरा
उनकी बिगड़ती सेहत

मैं कमज़ोर पड़ जाती हूँ
जब मैं देखना चाहती हूं
अपने घर के सदस्यों
के चेहरे पर खुशी और सुकून
और ये सब इसलिए की
मैं इन सब से बेइंतहा प्यार
करती हूं 

लेकिन ये भी बता दूं
मुझे कभी 
टेकन फ़ॉर ग्रांटेड मत लेना 
क्योंकि स्त्री तो हूँ पर 
कमज़ोर न बिलकुल नहीं ....... 


#रेवा 
#स्त्री 

Sunday, August 19, 2018

सवाल (लघु कथा )




कमला  दोपहर होते तक, घर का काम करते करते थोड़ा सा थक जाती थी,  ४३ की हो गयी है, यूँ तो उम्र के इस पड़ाव तक आते आते लोग सेटल हो जाते हैं। पर ऐसा कमला के साथ नहीं था......अभी अपना घर भी नहीं ले पायी थी ……अभी तो बुक करवाया है …लोन ले कर उसकी किश्ते चुकाती थी हर महीने  ……महीने के अंत तक हाथ एकदम खाली, पति को क्या बोले जानती वो खुद भी थी की कुछ बचता नहीं।
बेटे का अब १२ पूरा हो गया अब उसके आगे की पढ़ाई के लिए पैसों का जुगाड़ करना था, बेटे को लैपटॉप फ़ोन दोनों चाहिये था, बेटी भी १० में आ गयी अब फ़ोन उसे भी चाहिये।
उधर नन्द की बेटी की शादी होने वाली है, भाई को भात भरने की रस्म करनी होती है, उसके लिए भी मोटी रकम चाहिये।
अपने लिए तो कभी कुछ सोच ही नहीं पाती कमला, उसका भी मन करता कभी अपने लिए कुछ साड़ी ले ले , पर आजकल कपड़े गहने के दाम मे मिलने लगे हैं। बच्चों के साथ बाजार जाती, काफी चीज़ों पर मन चलता पर फिर लगता बच्चों को ज्यादा ज़रुरी है सामान दिलवाना, वो तो कैसे भी चला लेगी, मन मसोस कर रह जाती। सारे महीने बस दूसरे महीने के हिसाब में निकल जाते।
आज यही सब उसके दिमाग मे घूम रहा था की अचानक हँस पड़ी, इस बात पर की "लोग कहते हैं ४० के बाद जिम्मेदारी कम हो जाती है, अपनी ज़िन्दगी एन्जॉय कर सकते हैं, अपने मन की कर सकते हैं, पर क्या आम मिडिल क्लास गृहणी ऐसा कर सकती है  ???

#रेवा


Saturday, August 18, 2018

कामवाली बाई (लघु कथा )





ललिता रोज़ काम पर आती और बड़ बड़ करती रहती.......

"छोड़ देब अपन मरद के, अब न रही ओकरे साथ .... सगरा दिन पी कर पड़ल रहत है "
घर घर काम करके ४ बचवन के बड़ा कईली , पर ओकरा ओही ढंग ढाचा बा ......
बस "बड़का बिटवा कामये खाए लगे, फेर चल जाब इ घर दुआर छोड़ के  "
इस बात को चार महीने हो गए बेटे को नौकरी भी मिल गयी।

पर आज फिर रोते रोते आई "बीबी जी कुछो पेइसा एडवांस दे दो , मरद का सर फट गवा "
मैंने बोला "बेटे से क्यों नहीं लेती ?? " अब तो कमाने लगा है।

बोली "का करे बीबीजी बेटा भी बाप के जेइसन पी कर घर आवत है ...... हम के अउर बिटिया के मारत है "
हमरी किस्मत में कहाँ सुख ??
फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा "आप हे सही बोलत रहे "
हम अपनी बिटिया को अइसन नरक म नाही देब ..... अउर ३ - ४ घर काम पकड़ लेब  ...पर ओकरा  खूब पढ़ा लिखा कर अच्छा घर मा बियाह करब।

उसका चेहरा दुःख में भी इस निश्चय के साथ चमकने लगा ,और मुझे अपार ख़ुशी हुई की कम से कम एक लड़की की ज़िन्दगी में मैं कुछ अंतर ला पाई ।

#रेवा  

Friday, August 17, 2018

धूप और बरसात का मिलन




जानते हो
आज इस बरसात
और धूप के
खेल में
Fm में बजते
पुराने गानों के बीच
तुम्हारी बहुत
याद आ रही है ...

चारों तरफ हर
कुछ बहुत सुहाना है......
मौसम, गानें
और तुम्हारी याद ....

तो ऐसे में मुझे
खुश होना चाहिए.....
फिर भी मन उदास
सा क्यों हो रहा है  ??

तन्हाई नहीं
अकेलापन महसूस
हो रहा है
वो भी शिद्दत से

मैं खुद को समझ
नहीं पा रही की
आखिर क्या चाहिए मुझे ??
और ये आंखें
ये आंखें क्यों भीग
रही हैं बार बार  ???

सुनो
तुम तो सब जानते हो न
क्या तुम मेरी इस दशा को
समझ 
मुझे समझा सकते हो
बोलो, बोलो न .....

जानती हूं
तुम कुछ न बोलोगे
क्योंकी तुम जानते हो
धूप और बरसात
कुछ क्षण साथ रहते हैं
पर मिल कभी नहीं पाते ...

#रेवा

Thursday, August 16, 2018

क्षणिकाएं



बरसात पर कुछ क्षणिकाएं 

१. एहसासों की बरसात तो बहुत हुई 
    पर दिल आजकल कंक्रीट का जंगल 
    हो गया है 
    बिना जज़्ब हुए बह जाते हैं एहसास......

२. बड़ी मुश्किल से तन्हाई में
    खुश रहना सीखा था मैंने
    तेरी यादों की बरसात ने
    मेरी तमाम कोशिशों को
    बूँद बूँद कर बहा दिया.....

३.  गीले बरसात ने
    आज फिर ताज़ा कर दी
    सीली यादों को  
    उन्हें तुम बेरुखी की तपिश
    से बचाये रखना....


४. बादल जब धरती पर बरस जाते हैं तो
    आसमान बिलकुल साफ़ हो जाता है
    बस ऐसे ही मैं तुम्हारे काँधे पर 
    सर टिका कर बरसना चाहती हूँ......

५. इतनी बरसात के बावजूद
   जल की मछली
   जल में है प्यासी.....

#रेवा
#बरसात





Wednesday, August 15, 2018

कोशिश (जय हिन्द )


झगड़े किस घर
में नहीं होते  ?
ग़लतफ़हमी ग़लतियाँ
आम बात है.......
तो क्या हम घर से
मुंह मोड़ लेते हैं ?
घर के मुखिया को
बुरा भला कह कर
उसको उसके हाल पर
छोड़ देते हैं ??

जब हम ये अपने घर
के साथ नहीं करते तो
अपने देश के साथ
कैसे कर सकते हैं ??
दोष देना
बुरा भला कहना
बहुत आसान है
पर सुधारने की
कोशिश करना
थोड़ा मुश्किल ज़रुर है
नामुमकिन नहीं
कम से कम हम
अपने अपने स्तर पर
शुरुआत तो कर ही सकते हैं

बहुत कुछ
गलत हो रहा है देश में
मैं मानती हूँ
पर सरहद पर देश की
रक्षा करने वाले
देश के लिए मरने वाले
सैनिक तो गलत नहीं है,
उनके लिए
अपने इस प्यारे घर के लिए
आइये हम सब मिल कर
अपने देश को बेहतर
हिंदुस्तान बनाने की
पुरज़ोर कोशिश करें....


जय हिन्द !!!

#रेवा
#देश



Tuesday, August 14, 2018

यादें




जानते हो 
आज मैंने
हमारे यादों को
जीने की एक
कोशिश की है

उसी पुराने 
बस में बैठी 
सीट भी वही 
मिल गई जहां
हम अक्सर बैठा करते थे
जानती हूँ .....
वो बस बहुत लंबा
रूट लेती है 
पार्क तक
पहुंचाने में
लेकिन आज भी 
वो रास्ता
तय करना
मुश्किल नहीं लगा.....

मैं अपनी कविता 
ख़ुद को ही सुनाती रही
एक पल......
ऐसा लगा मानो तुम
बगल में बैठे
मग्न हो सुन रहे हो,,,,,

बस से उतर कर
पार्क के उसी बेंच
पर बैठी तो ....
अनायास ही एक
हिचकी आयी और
दो बूंद ओस 
छलक आये
पलकों पर...... 

सर टिका लिया बेंच से
लगा जैसे तुम्हारे कांधे
पर सर रखा हो
तभी मोबाइल पर fm
सुनाने लगा
वही पुराना गीत
"जो तुम याद आये बहुत याद आये "

सब वैसे का वैसा ही
तो है
अंतर बस इतना सा है
पहले तुम बगल में
हुआ करते थे
अब मेरे अंदर रहते हो .....


#रेवा
#याद