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Sunday, August 19, 2018

सवाल (लघु कथा )




कमला  दोपहर होते तक, घर का काम करते करते थोड़ा सा थक जाती थी,  ४३ की हो गयी है, यूँ तो उम्र के इस पड़ाव तक आते आते लोग सेटल हो जाते हैं। पर ऐसा कमला के साथ नहीं था......अभी अपना घर भी नहीं ले पायी थी ……अभी तो बुक करवाया है …लोन ले कर उसकी किश्ते चुकाती थी हर महीने  ……महीने के अंत तक हाथ एकदम खाली, पति को क्या बोले जानती वो खुद भी थी की कुछ बचता नहीं।
बेटे का अब १२ पूरा हो गया अब उसके आगे की पढ़ाई के लिए पैसों का जुगाड़ करना था, बेटे को लैपटॉप फ़ोन दोनों चाहिये था, बेटी भी १० में आ गयी अब फ़ोन उसे भी चाहिये।
उधर नन्द की बेटी की शादी होने वाली है, भाई को भात भरने की रस्म करनी होती है, उसके लिए भी मोटी रकम चाहिये।
अपने लिए तो कभी कुछ सोच ही नहीं पाती कमला, उसका भी मन करता कभी अपने लिए कुछ साड़ी ले ले , पर आजकल कपड़े गहने के दाम मे मिलने लगे हैं। बच्चों के साथ बाजार जाती, काफी चीज़ों पर मन चलता पर फिर लगता बच्चों को ज्यादा ज़रुरी है सामान दिलवाना, वो तो कैसे भी चला लेगी, मन मसोस कर रह जाती। सारे महीने बस दूसरे महीने के हिसाब में निकल जाते।
आज यही सब उसके दिमाग मे घूम रहा था की अचानक हँस पड़ी, इस बात पर की "लोग कहते हैं ४० के बाद जिम्मेदारी कम हो जाती है, अपनी ज़िन्दगी एन्जॉय कर सकते हैं, अपने मन की कर सकते हैं, पर क्या आम मिडिल क्लास गृहणी ऐसा कर सकती है  ???

#रेवा


8 comments:

  1. बहुत सुंदर कहानी 👌

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  2. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 21/08/2018
    को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  3. महीन भावों का भावपूर्ण चित्रण है रेवा जी।
    चाहे उम्र कोई भी हो औरत हमेशा स्वयं को प्राथमिकता की सूची में सबसे पीछे रखती है।

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  4. सत्य को बेहद ही ख़ूबसूरत तरीक़े से प्रस्तुत किया आपने आदरणीया, वाकई मध्यम वर्ग की औरत की ज़िंदगी अपनों को खुशी देने में ही बीत जाती है।

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