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Saturday, August 18, 2018

कामवाली बाई (लघु कथा )





ललिता रोज़ काम पर आती और बड़ बड़ करती रहती.......

"छोड़ देब अपन मरद के, अब न रही ओकरे साथ .... सगरा दिन पी कर पड़ल रहत है "
घर घर काम करके ४ बचवन के बड़ा कईली , पर ओकरा ओही ढंग ढाचा बा ......
बस "बड़का बिटवा कामये खाए लगे, फेर चल जाब इ घर दुआर छोड़ के  "
इस बात को चार महीने हो गए बेटे को नौकरी भी मिल गयी।

पर आज फिर रोते रोते आई "बीबी जी कुछो पेइसा एडवांस दे दो , मरद का सर फट गवा "
मैंने बोला "बेटे से क्यों नहीं लेती ?? " अब तो कमाने लगा है।

बोली "का करे बीबीजी बेटा भी बाप के जेइसन पी कर घर आवत है ...... हम के अउर बिटिया के मारत है "
हमरी किस्मत में कहाँ सुख ??
फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा "आप हे सही बोलत रहे "
हम अपनी बिटिया को अइसन नरक म नाही देब ..... अउर ३ - ४ घर काम पकड़ लेब  ...पर ओकरा  खूब पढ़ा लिखा कर अच्छा घर मा बियाह करब।

उसका चेहरा दुःख में भी इस निश्चय के साथ चमकने लगा ,और मुझे अपार ख़ुशी हुई की कम से कम एक लड़की की ज़िन्दगी में मैं कुछ अंतर ला पाई ।

#रेवा  

10 comments:

  1. बहुत सुंदर कहानी 👌

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  2. सार्थक रचना 🙏

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-08-2018) को "सिमट गया संसार" (चर्चा अंक-3068) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सुन्दर कहानी

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