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Tuesday, July 24, 2012

उफ्फ ये दर्द


उफ्फ ये दर्द
जब होता है  तो ,
हर चीज़ इसके सामने छोटी हो जाती है ,
मन बदलने के लिए कुछ भी करो
हर बार दर्द अपनी जगह बना ही लेता है ,
गाने सुनो तो ,
गाने के बोल नश्तर चुभाते हैं ,
कोई प्यार से बात करे तो
ये और भी बढ़ जाता है ,
हर वो चीज़ ,
जो सुकून देनी चाहिये
वो दर्द का एहसास कराती है ,
लगता है
सारे ज़माने की तकलीफ सिमट कर
खुद की झोली में आ गयी हो ,
कहा जाता है की
दर्द जिसने अनुभव किया हो
उसे ही सुख की अनुभूति होती है ,
पर क्या सुख के लिए
इतना दर्द बर्दाश्त करना जरुरी है ?

रेवा

28 comments:

  1. वाह भावमय करती प्रस्‍तुति।

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    1. shukriya Amrendra ji....hamesha padhne kay liye

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  3. दुःख और दर्द....
    किस्मत और कर्मों की बात है....
    जरुरी कुछ भी नहीं....रेवा जी.....
    बस.....बिना दुःख झेले सुख का एहसास नहीं होता ....
    और.....सुख तभी अच्छा लगता है...जब दुःख झेला हुआ होता है.....
    सब अपने अपने कर्मों का फल है......
    अगर मनुष्य हमेशा एक बात अपने दिमाग में रखे कि......
    'यह क्षण भी निकल जाएगा'....
    तो...उसको दुःख कम होगा और ख़ुशी के समय भी उसके पैर ज़मीन पर ही रहेंगे....


    रचना में बखूबी दर्द भरने के लिए....आप और आपकी कलम....दोनों ही बधाई के पात्र है.......
    आने वाली और भी बहुत सी रचनाओं के लिए...ढेर सारी शुभकामनायें.....

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    1. Sansacji....bahut bahut dhanyavad...hausla badhane kay liyee

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  4. सुख की अनुभूति भी दुख के बाद ही पता चलती है ...सटीक बात

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    1. sangeetaji...shukriya samay nikal kar apne padha aur saraha

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  5. kya keh diya hai riwa jiiiiiiii dard hi dard.

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  6. दर्द के बाद सुख अच्छा लगता है ... पर किसी छोटे से सुख के लिए गहरे दर्द की पीड़ा क्या जरूरी है ...

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    1. sahi kaha Digabmar ji...dhanyavad

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  7. शायद दर्द जब नहीं होता वही सुख होता है......

    सुन्दर भाव रेवा जी...

    अनु

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  8. दर्द का भी अपना एक अलग ही मज़ा है...
    सुन्दर और सार्थक शब्द रचना !!

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    1. kamleshji aap hamesha padhte hain...dhanyavad

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  9. Replies
    1. pratibha ji bahut bahut shukriya

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  10. आज 26/07/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  11. yashwantji bahut bahut shukriya

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  12. जब दर्द नहीं था सीने में तब ख़ाक मज़ा था जीने में...

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  13. दर्द ही दर्द में लिप्त हर शब्द हैं

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