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Saturday, August 4, 2012

साँझ की बेला

शाम का सुहाना मौसम ,
बादल साँझ की चादर ओढे 
रात्रि की तरफ बढ़ रहा था /
पक्षी अपने अपने घोसलों की ओर जा रहे थे  
हवा अपने पुरे योवन के साथ 
मदमाती हुई बह रही थी,  
ऐसे मे मैं अकेली बैठी 
इस प्रकृति के पुरे सौंदर्य के साथ भी
खुद को अकेला महसूस कर रही थी ,
पर तभी अचानक हवा के झोके की तरह 
तेरा पैगाम आया ,
उस एक प्यार भरे पैगाम को पा कर 
मेरा मन मयूर नांच उठा ,
अब ये साँझ की बेला तनहा न हो कर 
हमारे प्यार से महकने लगी /


रेवा 


8 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत ख्यालो से रची रचना......

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  2. Aapka jeewan sada mehke yahee dua hai!

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  3. साँझ का बहुत सुन्दर चित्रण करती एक मधुर शब्द रचना !
    गहरी शुभकामनायें !!

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  4. saanjh ki bela bahut sunder ho gayi hai *****
    manohari prastuti

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  5. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.
    बहुत सुंदर बात कही है इन पंक्तियों में. दिल को छू गयी. आभार !


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  6. aap sabka bahut bahut shukriya....

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