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Wednesday, July 30, 2014

आकाश और धरती का प्यार


आज जब छत पर खड़ी
आकाश और धरती को
निहार रही थी ,
तो अचानक ख्याल आया
की कितने दूर हैं न दोनों
एक दूजे से ,
रोज़ टकटकी लगाये
देखते रहते हैं
पर मिल नहीं पाते ,
उनकी तड़प का
अंदाज़ा लगाना मुश्किल है ,
बाँहें फैलाये धरती
बस आकाश का ही
इंतज़ार करती रहती है ,
और तड़प की हद
जब पार हो जाती है
तब होती है बरसात…....
आह ! कैसी
खिल उठती है धरती ,
हरी चूनड़ ओढ़
तन - मन
से स्वागत करती है
अपने प्यार का..........


रेवा

15 comments:

  1. बहुत सुन्दर ! इसी भाव पर मेरा एक हाईकू देखिये !
    बरसा पानी
    धरती हुलसानी
    चूनर धानी !

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31-07-2014 को चर्चा मंच पर { चर्चा - 1691 }ओ काले मेघा में दिया गया है
    आभार

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  4. वाह..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  5. बरसात माध्यम है धरती आकाश के मिलन का ...
    बहुत खूब ...

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  6. bahut sundar ....yah pyar hi bandhe rakhta hai un dono ko

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  7. आहा अत्यंत खुबसूरत रचना

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  8. तीज की शुभकामनाएं ...बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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