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Thursday, March 17, 2016

दुखी तू भी दुखी मैं भी !!







तू रोता है अपने दुःख से 
और मैं 
रोती हूँ
प्यार की चाहत मे  ,
तुझे कन्धा चाहिए 
सर रख कर रोने के लिए
और मुझे
प्यार महसूस
करने के लिए


तुझे कोई ऐसा चाहिए 
जो तेरे आँसूं पोंछ सके 
और मुझे ऐसा 
जो मेरे आंसुओं को 
समझ सके 


कितने अलग हैं न
दोनों के एहसास
पर दुखी तू भी
दुखी मैं भी !!



रेवा




Monday, February 8, 2016

लेखन कला





लिखती हूँ मिटाती हूँ
जाने क्यों
कविता नहीं बुन पाती हूँ 
कभी दोहे की तलाश मे
अटक जाती हूँ 
कभी शब्द टंग जातें है  दिल के 
तारों पर 
तो कभी एहसास 
दगा दे जातें हैं 
कभी लगता है छन्द मे बंध गए 
मेरे सवाल 
तो कभी
छंद मुक्त कविताओं  मे 
निकलता है
दिल का गुब्बार ,
तो कभी हो  जाता
मुझे क्षणिकाओं से प्यार ,
पर चाहे जो भी लेखन कला
ये शब्दों का जाल  
दिल मे जगाता रहता है
कलम और कागज़ से प्यार

रेवा




Monday, January 11, 2016

औरत







औरत

नाम है ऐसे जीव का
जो हमेशा पिसती रहती है
दो पाटों मे
कभी ससुराल तो
कभी मायके के नाम पर
कभी पति तो कभी
बच्चों के नाम पर .....
उसके मन की बात कभी
कोई नहीं सुनता
क्योंकि वो खुद की
कहाँ सुनती है ??

एक घर जन्म का
एक घर कर्म का
पर न वो जन्म 
वालों की हो पाती है
न कर्म वालों की
ता उम्र दोनों के लिए
परायी बन
गुज़ार देती है


तमाम रिश्तों के बीच
परायी स्त्रियों को
सलाम मेरी इस
लेखनी द्वारा
और अंत में कहना चाहूँगी
"बेटी हूँ बहू हूँ
बीवी हूँ माँ हूँ
पर सबसे पहले
हाड़ मांस की इन्सान हूँ






रेवा

Saturday, December 19, 2015

मटर


ठण्ड के आगमन के साथ
मटर सबके घरों मे
ख़ुशी ख़ुशी आई,
सारी गृहणियाँ को
ये बहुत सुहाई
अब घण्टो की
सोच हुई कम
जबसे मटर रानी
बोली आ गए हम ,
मटर को सबके साथ
घुला मिला
स्वादिष्ट व्यंजन सबने बनाई
इसी बात पर तो ये मटर रानी
इतराई ,
और फ़िलहाल
100 रुपया किलो मे आई ,
फिर भी सभी के मन भाई
भिन्डी , तोरु , परवल
हुए सब फीके
जबसे घरों मे
मटर रानी आई ,
अब तो सभी ने
यही पुकार लगाई
जय हो मटर रानी
जय हो मटर रानी !!
रेवा

Friday, November 27, 2015

आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……



आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

बीते लम्हों मे भरा एतबार पढ़ा
हँसी और आंसुओं का सैलाब पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

खुद के लिए तुम्हारी फ़िक्र तुम्हारा ख्याल पढ़ा
भुखी दुपहर को तुम्हारा इंतज़ार पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

सिंदूरी शामों को कॉफ़ी का साथ पढ़ा
बेक़रार रातों को तुम्हारा एहसास पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……

झूठे वादों का अल्फ़ाज़ पढ़ा
टूटती सांसों से यादों का कलमा पढ़ा
आज पुरानी डायरी मे बेशुमार प्यार पढ़ा ……


रेवा




Thursday, November 19, 2015

उपहार






दीये से इन नयनों मे
प्यार की बाती
जलायी है
तुम अपने
एहसासों के तेल से
इसे सदा 
सींचते रहना......
फिर देखना 
हमारे घर मे हर दिन 
दीवाली सी 
जगमगाहट फैली रहेगी,
दोगे न 
मुझे दीवाली का ये
उपहार !!!

रेवा

Monday, October 19, 2015

समुन्द्र


जब दूर दूर समुन्द्र पर
नज़र पड़ती है
तो प्रतीत होता है
समुन्द्र क्षितिज से
मिलने को बेताब है
पर उसकी
नियति ही है विरह .......

इसलिए तो
हर बार कोशिशें
नाकाम  हो जातीं हैं
और समुन्द्र की
लहरों को
किनारे की पनाह मिलती है !!!

रेवा