प्यार शब्द खुद मे इतना प्यारा है की इसे किसी परिभाषा की ज़रूरत नहीं ……ये एक एहसास है जो बस महसूस किया जा सकता है,पर इसके साथ ये भी सच है की प्यार की बड़ी बड़ी बातें सभी लोग कर लेते है……पर सच्चा प्यार बहुत कम लोगों के नसीब मे होता है……ये भी माना के प्यार दर्द भी देता है पर अगर ये सच्चा है तो संतुष्टि भी देता है…ऐसा प्यार हमे प्रभु के और करीब ले जाता है …ये मेरी भावनाएं और एहसास , इन्हीं को शब्द देने की कोशिश है मेरी …....
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Sunday, February 14, 2010
Saturday, February 13, 2010
Tuesday, January 26, 2010
Tuesday, December 29, 2009
मन करता है
मन करता है धुप की चादर ओढ़ कर सो जाऊं ............
खो जाऊं उस दुनिया में जहाँ ,न गम हो
न आँसू ,ना कोई दुःख ..........
मन करता है धुप की चादर ओढ़ कर सो जाऊं ...........
तेरी गोद हो सर रखने को ,
तेरी बाँहो का बिस्तर हो ,
और प्रेम भरा तेरा स्पर्श हो ,
मन करता है धुप की चादर ओढ़ कर सो जाऊं ............
इस ठण्ड की भरी दुपहरिया मे ,
बस मै हूँ और तुम हो ,
और हो हमारे प्यार की खुशबू हर तरफ ,
मन करता है धुप की चादर ओढ़ कर सो जाऊं ........
रेवा
Tuesday, December 15, 2009
काश !
काश तुमने मुझे कभी तो समझा होता .......
एक पल नज़र भर के देखा तो होता ,
एक पल मेरी नजरों को पढ़ा तो होता ,
एक पल मेरी तड़प को महसूस किया तो होता,
काश तुमने मुझे कभी तो समझा होता ........
जब जब तेरी जरूरत महसूस हुई दूर ही पाया तुझको ,
जब जब तेरे करीब गई दूर ही पाया तुझको ,
जब जब तेरे पहलु में पनाह मांगी दूर ही पाया तुझको ,
काश तुमने मुझे कभी तो समझा होता ..........
अब तो ये आलम है की दर्द लहू बन कर रिसता रहता है ,
आँखों से आंसू ऐसे बरसते है जैसे बादल से बारिश की बुँदे ,
हँसी होंठो का साथ देने से इंकार करती है ,
काश तुमने कभी मुझे दिल से महसूस तो किया होता ,
काश तुमने मुझे कभी तो समझा होता .....................
रेवा
Wednesday, December 9, 2009
क्या खोया क्या पाया
आज जब अपनी ज़िन्दगी के बारे मे सोचा,
इतने दिनों मे मैंने क्या खोया क्या पाया
तो पता चला की खोया तो शायद बहुत कुछ .....
कभी अपना सुख ,कभी अपने दुःख
कभी अपनी हँसी ,कभी अपने आँसू
कभी अपना सपना ,कभी कोई अपना
कभी अपना जोश ,कभी अपने रोष
कभी अपनापन ,कभी परायापन
कभी अपनी अभिलाषा ,कभी अपनी निराशा
कभी प्यार ,कभी दुलार
कभी अपना अस्तित्व ,कभी अपनी पहचान
पर इन सब के बीच बस पाया है एक साथ
ये कागज और ये कलम
ये कागज और ये कलम ....................
रेवा
Wednesday, December 2, 2009
मन
अपने मन को कैसे वश मे करू
क्यों यह भागता रहता है
क्यों भावुकता मे बहता रहता है
जब यह जानता है की भावुकता की कोई कदर नही फ़िर भी.............
क्यों भवनाएँ इतनी कोमल होती है
की जरा सी ठेस बर्दाश्त नही कर पाती ...............
क्यों आँखों से यह अश्रु धार अविरल बहते है
क्यों यह मन आहत होते हुए भी बन्धनों मे
बंधता रहता है .............
क्यों .........
रेवा
क्यों यह भागता रहता है
क्यों भावुकता मे बहता रहता है
जब यह जानता है की भावुकता की कोई कदर नही फ़िर भी.............
क्यों भवनाएँ इतनी कोमल होती है
की जरा सी ठेस बर्दाश्त नही कर पाती ...............
क्यों आँखों से यह अश्रु धार अविरल बहते है
क्यों यह मन आहत होते हुए भी बन्धनों मे
बंधता रहता है .............
क्यों .........
रेवा
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