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Tuesday, July 30, 2013

गृहणी

गृहणी को किस मिट्टी से
गढते हैं भगवान ?
उसका अपना कुछ भी क्यों नहीं होता ?
न उसकी इच्छा, न उसका मन
जब जिसका जैसे मन होता है
वो उस के साथ वैसा ही बर्ताव करता है ,
अगर पति का मन अच्छा नहीं
ऑफिस मे कुछ हुआ या फिर
और कोई बात हो तो  ,
झेलना पत्नी को है
उसकी कडवी बातें और ख़राब मूड दोनों ,
अगर बच्चों का मन अच्छा नहीं तो
झेलना माँ को है ,
अगर सास ससुर को कुछ नागवार गुजरा तो
झेलना बहू को है ,
इन सब मे उसका अपना मन
अपनी इच्छा कुछ मायने रखती है क्या ?
बस खुद को एक अच्छी पत्नी, माँ और बहु
साबित करती रहे ज़िन्दगी भर,
और खुद को भूल ही जाये
तभी ये जीवन चल सकता है सुख शांति से  ,
सदियाँ गुजर गयी
इक्कीसवी सदी के हैं हम लोग
पर एक गृहणी अभी भी वहीँ की वहीँ ,
गृहणी को किस मिट्टी से
गढ़ते हैं भगवान ?????

रेवा



Tuesday, July 23, 2013

बेगानी आंखें

आज तुमसे बात कर के
दिल थम गया
उस लम्हे मे
लगा साँसें रुक गयी हो ,
और तब
ये आँखें भी अजीब हो जाती हैं
लगता ही नहीं की मेरी आँखें हैं
ये तुम्हारे प्यार से सरोबार हो कर
बरसने लगती हैं ,
समझ ही नहीं आता की
इन्हे क्या हो जाता है ?
इतनी प्यार भरी बातें
ना किया करो तुम ,
इन आँखों को और मुझे
बेगाना ना किया करो तुम /

रेवा





Saturday, July 20, 2013

नखरालू बादल

ये बादल भी न बिलकुल
तुम्हारी तरह नखरालू हैं
अपने होने का एहसास कराते हैं
फिर बिन बरसे चले जातें हैं ,

आसमान पर रोज़ छा जातें हैं
लगता है बस अब बरसे
तब बरसे
पर दिन ढलते ढलते
रूठ कर छिप जातें हैं ?

फिर से आ जाती है
हलकी सी धुप,

क्यों तड़पाते हो इतना ?
कभी तो टूट कर बरसो
तपते मन की तृष्णा शांत करो ,

देखो अब न बरसे
तो रूठ कर चली जाउंगी
फिर न कहना
" मेरे प्यार की बरसात मे
  भिगो न आज "

रेवा



Wednesday, July 10, 2013

माँ

माँ के बारे मे
हर रोज़ कितना कुछ लिखते हैं लोग
फिर भी बहुत कुछ अनकहा रह जाता है ,
'माँ ' ये शब्द ही इतना प्यारा है की
सोचने भर से मन प्यार से भर उठता है /

जानती थी माँ बड़ी बेटी है सामर्थवान
इसलिए रहती थी निश्चिन्त उसकी तरफ से
पर पता था उसे
छोटी कभी कुछ बोलती नहीं
पर दिक्कतों से चलाती है अपना घर संसार ,
माँ के पास भी धन नहीं था ज्यादा
फिर भी खुद पर एक पैसा खर्च नहीं करती थी
जोड़ जोड़ कर रखती और किसी बहाने से
छोटी को थमा देती ,
लाख मना करती छोटी
पर एक न सुनती माँ ,
ज्यादा बोलती छोटी तो रोने लगती
छोटी की एक न चलती ,
उसे ये भी समझाती
न बोलना बड़ी को वर्ना
उसे लगेगा बहनों मे भेद करती है माँ ,
माँ का ये भी एक रूप है
मरते दम तक बस अपने
सब बच्चों को खुशियाँ ही देना चाहती है ,
कभी कोई पूरी तरह
माँ को परिभाषित न कर पाया है
न कर पायेगा /

रेवा

Friday, July 5, 2013

छोटी सी बूंद

कविता के सागर मे
जब गोता लगाया तो
पाया की इस गहरे सागर में
बहुत कुछ छिपा है,
कई सीप
कुछ छोटे ,कुछ चमकीले
और कईयों के अन्दर मोती भी मिले  ,
सागर मे आती लहरों
और नदियों को देखा और जाना
तो लगा की
इस सागर मे तो मैं
एक छोटी सी बूंद हूँ
जो अपना अस्तित्व
तलाशने की जद्दो जेहद मे लगी है ,
इस आशा मे की शायद कभी
वो भी एक लहर बन जाये /


रेवा


Wednesday, July 3, 2013

पिया सदा निभाना मेरा साथ

कितना अलग हुआ आकाश 
मन मयूर बन डोले आज
मदहोश हुए मेरे ज़ज्बात
बांधू गीतों मे  इन को या
हवा में बहने दूँ एहसास ,
ख्वाबों ने दे दी है दस्तक
जाने क्या हो जाएगा अब
बिना बात मुस्कुराने कि
होगी अब तो शुरूआत
या भीग़ जाएँगी पलकें
कर तुझे यूं ही याद ,
या सूख जाएगी ये धरती 
बिन बादल और बिन बरसात ,
पर जैसे भी हो मेरे जज्बात 
एक बात तुझे कहनी है आज 

"पिया सदा निभाना मेरा साथ "


रेवा