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Saturday, August 3, 2013

बोझिल दिल





पहले जब भी दिल
तुम्हारे होते हुए भी
तुम्हारे लिए तडपता था
बोझिल हो जाता था ,
तो लगता था
शायद तुम्हें
मेरी भावनाएं
समझ ही नहीं आती ,
तो क्या फ़ायदा
खुद को कष्ट
और तुम्हे दोष देकर ,
पर अब
जब मैं जान गयी हूँ की
तुम इतने भी अनजान नहीं ,
अपने किये
और मेरी हालात
से वाकिफ हो तो ,
किस तरह खुद को समझाऊं ?
क्या तुम्हारा
मन नहीं करता की
मुझे भी वो खुशियाँ
मिलनी चाहिए
जिनसे तुमने मुझे
अभी तक महरूम रखा ,
पर अगर कोई
समझ के भी
न समझे तो
ये सवाल जवाब
सब बेकार ,पर

"ये बोझिल दिल लिए सीने मे
क्या ख़ाक मज़ा है जीने मे "

रेवा


13 comments:

  1. Samajh rahi hoon
    kahanaa aasaan hota hai
    jinaa Bahut hi mushkil
    God Bless U

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  2. बहुत संवेदनशील प्रस्तुति...

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  3. भावो की अभिवयक्ति......

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  4. बोझ कम हो, हल्का हो दिल, फिर भी जीवन कभी कभी मुश्किल ही जान पड़ता है...
    जाने क्या रहस्य है!

    सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  5. दिल है बोझिल,
    तो गनीमत है, कुछ मिल सकता है इससे ,
    बहुत बेचैन है,
    परेशान है , हर शहर, खालीपन से ॥

    आपकी कविता ने मुझे एक कविता लिखने के लिए प्रेरित किया । कृपया पूरा पढ़ने के लिए लोग इन करे
    http://mishrasp.blogspot.in

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  6. इस दिल के बहुत से भाव है ...हर रोज़ भाव बदल जाता है ...

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  7. aap to bahut gehre nijke di....................bahut kuchh keh diya.....speech less

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