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Monday, May 12, 2014

अस्तित्व

आज क्या लिखूं ?
हर बार यही सोचती हूँ
और फिर
हमेशा तुम्हे हि लिखतीं हुँ
कब तुमने मुझे प्यार किया
कब तिरस्कार ,
कैसे तुमने मेरी कद्र कि
और कैसे मेरी तरफ़ से आँखें हि
मुंद ली ,
तुम्हे हि तो नापती तौलती
रही ,
क्या मेरा अस्तित्व तुम्हारे
बिना कुछ नहीं ?
"मैं" का "हम" मे बदलना
क्या अलग अस्तित्व के
मायने ख़त्म कर देता  है ???

रेवा

13 comments:

  1. हम का अस्तित्व मैं के अस्तित्व से ही तो बना है ... फिर वो कम कैसे ...

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  2. आपकी लिखी रचना मंगलवार 13 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. वाह बेहतरीन..... जीवन के करीब से गुजरते शब्द ॥ एक एक शब्द ... .....बधाई

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (13-05-2014) को "मिल-जुलकर हम देश सँवारें" (चर्चा मंच-1611) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. बहुत सुन्दर.....

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  6. "मैं " के बिना" हम " हो नहीं सकता !
    बेटी बन गई बहू

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  7. अस्तित्व की लड़ाई में मैं... तुम... हम... सब खो जाता है ..

    ~सादर

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  8. bahut sundar baat kahi aapne ...

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  9. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति, धन्यबाद।

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