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Wednesday, July 4, 2018

झील के इस पार



याद है तुम्हें 
वो झील के
किनारे की पहली
मुलाकात
कितना हसीं था न
वो इत्तेफ़ाक

तुम किसी और शहर के
मैं कहीं और की
अपने अपने शहरों से दूर
मिले थे किसी और जगह पर
देखा नहीं कभी एक
दूजे को
पर बातों ही बातों में की थी
अनगिनत मुलाकात
एक ख़्वाहिश
जरूर थी दिल में
एक बार
तुम्हें इन नज़रों से
निहारूँ तो सही

उस दिन लगा
ऊपर वाले ने
सुन ली मेरे दिल की पुकार
तुम और मैं मिले थे फिर
झील के इस पार

भरी भीड़ में पहचान लिया था
तुमने मुझे
और फिर पी थी हमने
कॉफी बातों के साथ
कुछ देर में चले गए तुम
और मैं भी
पर वो शाम
वैसी की वैसी टंगी है
आज तक मेरे दिल की
दीवार पर
जब मन होता है
उतार कर जी लेती हूं
और एहसासों का इत्र लगा
टांग देती हूं फिर उसी जगह !!


रेवा

8 comments:

  1. खूबसूरत एहसास से भरपूर है आपकी रचना

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  2. वाआआह लाजवाब

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 5.7.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3022 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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