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Saturday, July 7, 2018

गिरगिट



बचपन में 
देखा था बड़े
गौर से गिरगिट को
रंग बदलते हुए
अचरज तो हुआ था
पर बहुत खुश भी हुई थी
ऐसा कुछ देखते हुए 

अब बड़े गौर से
देखती हूँ
मनुष्यों को रंग
बदलते हुए
कितानी जल्दी
इतने तरह के
रंग बदल लेते हैं 
माशाल्लाह 

पर खुशी बिल्कुल
नहीं होती
एक बात बताओ ज़रा
इतने गिरगिटिया कैसे
हो लेते हो !!!


रेवा

11 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (08-07-2018) को "ओटन लगे कपास" (चर्चा अंक-3026) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Replies
    1. शुक्रिया सदा जी

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  3. अब गिरगिट कहाँ रंग बदलते हैं, ये काम तो उन्होंने इंसानों के हवाले कर दिया है
    बहुत सही

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    1. जी सही कहा.....शुक्रिया

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. सुंदर रचना रेवा जी अब गिरगिट खुद अचंभित हैं इंसानों को रंग बदलते देख बेहतरीन 👌👌

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    1. सच कहा आपने ......शुक्रिया

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