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Saturday, June 19, 2010

उफ्फ्फ वो कॉलेज के दिन

उफ्फ्फ्फ़ वो कॉलेज के दिन भी क्या दिन थे
वो बातें वो मुलाकातें ........
वो कैंटीन की मस्ती ...वो छीना झपटी
बगल की बेंच खाली रखना और तेरा इंतज़ार करना
तेरा हमेशा की तरह पेन भूल जाने के
बहाने मुझे देखना .......
ठण्ड में घंटो धुप में बैठ कर फाइल पूरा करना
तेरा पैसे न लाना और मेरी शाल गिरवी रख
कर किताब लेना ........
घंटो कॉलेज की सीडी पर बैठ कर बातें करना
घर से जूठ बोल बोल कर कॉलेज में मिलना
बरसात में एक छत्री के निचे रहने के लिए अपनी छत्री छुपाना
अनगिनत ऐसी यादें .............
काश वो दिन फिर आ जाये ..........
उफ्फ्फ वो कॉलेज के दिन

रेवा

Monday, June 14, 2010

दोस्त और प्यार

वक्त का आँचल थाम
ज़िन्दगी की राहों को जान
आगे बढ़ गयी मैं अनजान,

प्यार ने कहा पुरे करूँगा 
तेरे प्यार के अरमान ,
दोस्त ने कहा दूंगा तुझे मान
तेरी कमियों को जान
रिश्तों  पर हावी न होने दूंगा ये मान,

पर जब समय पड़ा आन
दोस्त ने कहा तू है अनजान
तेरी कमियां है महान,

प्यार ने दी दुहाई मेरी जान
मैं हुं मामूली इंसान
न पुरे कर सकू तेरे अरमान,

ये कैसी है दुनिया
कैसे हैं  इंसान ?
माँगा था बस प्यार और मान
वो भी न दे सका इंसान l 



रेवा


Thursday, June 10, 2010

वो ढलती शाम

काश वो ढलती शाम फिर आ जाये 

फिर मैं उस भीढ़ भाड़ मे खड़ी तेरा इंतज़ार करु
फिर तू कहीं नज़र न आये
फिर से मै बेक़रार हो जाऊ 
और इंतज़ार मैं तेरे अपनी रुमाल के कोने घुमाऊ ,

फिर अचानक भीड़ में तेरा नज़र आना
हमारी नज़रों का मिलना
नज़रों ही नज़रों में एक दुसरे को पहचानना 
और शर्म से मेरी नज़रों का झुक जाना ,

फिर वो कॉफ़ी  और चने के साथ अनगिनत बातें करना
बातो के साथ नज़रे चुरा कर एक दुसरे को देखना ,
झील के किनारे होले होले ठंडी हवा के साथ बहना
चाँद का झांक कर हमे देखना
वक़्त का ठहर सा जाना ,

काश वो ढलती शाम फिर आ जाये l 


रेवा


Tuesday, June 8, 2010

क्या बताऊँ

क्या बताऊँ  कितना प्यार है तुझसे
दुःख में सुख की अनुभूति है तुझसे 

एक खिचाव एक जुड़ाव है तुझसे 
हर पल एक मीठा एहसास है तुझसे

हवा में खुशबू है तुझसे 
बारिश की बूंदों की फुहार है तुझसे

चांदनी की शीतलता है तुझसे 
दिल के हर एक तार मे मधुर झंकार है तुझसे

मेरे जज्बातों को पनाह मिली है तुझसे
क्या बताऊँ तुझे की कितना प्यार है तुझसे

मेरी ज़िन्दगी का सार ही है तुझसे 


रेवा

Thursday, May 20, 2010

कैसी है ज़िन्दगी

किसी ने एक दिन मुझसे प्रशन किया
बता कुछ अपनी ज़िन्दगी के बारे में
मैं सोच में थी की क्या जवाब दू क्या बताऊ
कैसी है ज़िन्दगी ................

क्या बताऊ की हर पल एक अधूरेपन का एहसास है ज़िन्दगी
हर चीज़ मिली है किस्तों में .............
अधुरा बचपन अधुरा यौवन
अधुरा प्यार अधूरी दोस्ती
अधूरी हंसी अधूरी ख़ुशी
अधूरे बिखरे सपने
अधूरे मेरे अपने ........

क्या बताऊ कैसी है ज़िन्दगी ......
आंसू की धार है ज़िन्दगी
उदासी गले का हार है ज़िन्दगी
क्या बताऊ की कैसी है ज़िन्दगी ................

रेवा

Monday, May 10, 2010

क्या यही मेरी जिन्दगी है

बहुत इंतज़ार के बाद तुम आये
एक विरहन के तपते ह्रदय में
ठंडी हवा का झोंका बनकर .............

यथासंभव मुझे मेरे स्थान से डिगा कर
परम सुख की अनुभूति बनकर ..........

मैं भी ऐसे रमी तुझमे के भूल ही गयी
की एक दिन तू फिर मुझे उसी
स्थान पर छोड़ कर चला जाएगा .........

फिर उसी इंतज़ार ...उसी तड़प...उसी विरह वेदना
में जलने के लिए ,
उसी आंसुओं के समंदर मैं गोता लगाने
के लिए छोड़ जाएगा ...........

क्या यह इंतज़ार कभी ख़त्म न होगा
क्या मैं सदा ही तड़पती रहूंगी
क्या यही मेरी ज़िन्दगी है ???

रेवा

Sunday, May 2, 2010

क्या लिखूं

क्या लिखूं की आज एहसासों को शब्दों
में ढालने की कोशिश नाकाम हो रही है , 
क्या लिखूं अपने मन की उलझन या
पीड़ा ,या कुछ प्रशन ? 

क्या अपने लिए जीना गुनाह है ?
जब तक आप लोगों के लिए ,
उनकी ख़ुशी के लिए जीयो  
आप अच्छे हो ,
जहाँ आप अपने लिए जीने की कोशिश करो ,
तो आप स्वार्थी हो ,
वाह री दुनिया ,वाह रे लोग ,


क्या लिखूं उस उलझन को के जब तक प्यार नहीं था जीवन में ,
तब तक पता ही नहीं था की प्यार क्या होता है ?
अब जब है ,तो पता नहीं सही या गलत ?


क्या लिखू की एक अंतहीन पीड़ा है मन में
हर पल सही होते हुए भी गलत ठहराया जाना ,
हर पल दोस्ती के लिए जान देते हुए भी ,ठुकराया जाना , 
पूरा प्यार न्योछावर करते हुए भी , उसके लिए भीक मांगना ,
जिस से प्यार की आशा हो , 
उससे बस ,जिम्मेदारी और तिरस्कार पाना ,
जिससे कोई रिश्ता नाता न हो उससे प्यार मिलना ,
और फिर खुद को हर पल कठघरे में खड़ा करना l 

क्या लिखूं की आज एहसासों ने  
शब्दों का साथ छोड़ दिया है l 

रेवा