प्यार शब्द खुद मे इतना प्यारा है की इसे किसी परिभाषा की ज़रूरत नहीं ……ये एक एहसास है जो बस महसूस किया जा सकता है,पर इसके साथ ये भी सच है की प्यार की बड़ी बड़ी बातें सभी लोग कर लेते है……पर सच्चा प्यार बहुत कम लोगों के नसीब मे होता है……ये भी माना के प्यार दर्द भी देता है पर अगर ये सच्चा है तो संतुष्टि भी देता है…ऐसा प्यार हमे प्रभु के और करीब ले जाता है …ये मेरी भावनाएं और एहसास , इन्हीं को शब्द देने की कोशिश है मेरी …....
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Wednesday, April 24, 2013
Sunday, April 21, 2013
आखिर कब तक ??
पता नहीं क्या हो गया है
इंसानों को ?
छोटे बच्चों को तो हम
भागवान मानते हैं
उनके साथ ऐसा अत्याचार ,
आज बच्चों को बहार
भेजने मे डर लगने लगा है ,
उन्हें जाने अनजाने हम बाँधने लगे हैं
यहाँ मत जाओ
वहाँ मत खेलो
अकेले कहीं न जाओ
ये मत पहनो
वो मत पहनो ,
पर क्या इन सब से भी
कुछ असर हो रहा है
नहीं ,
आये दिन एक नयी घटना
और उस पर नयी बेहेस ,
कोई किसी को दोष देता है
कोई किसी को ,
पर ये कोई नहीं समझता की
आज बच्चों से उनका
बचपन छिन लिया गया है
जाने या अनजाने
माँ बाप भी डरे सहमे रहने लगे हैं ,
कितना भी खुद मे
जोश भर लो
हिम्मत दिखा दो
पर अन्दर से सब डरे हुए ,
पर कब तक जियेंगे
हम और हमारे बच्चे
ऐसी ज़िन्दगी
आखिर कब तक ??
कैसे बदलेगा ये समाज
और लोगों नजरिया ??
रेवा
इंसानों को ?
छोटे बच्चों को तो हम
भागवान मानते हैं
उनके साथ ऐसा अत्याचार ,
आज बच्चों को बहार
भेजने मे डर लगने लगा है ,
उन्हें जाने अनजाने हम बाँधने लगे हैं
यहाँ मत जाओ
वहाँ मत खेलो
अकेले कहीं न जाओ
ये मत पहनो
वो मत पहनो ,
पर क्या इन सब से भी
कुछ असर हो रहा है
नहीं ,
आये दिन एक नयी घटना
और उस पर नयी बेहेस ,
कोई किसी को दोष देता है
कोई किसी को ,
पर ये कोई नहीं समझता की
आज बच्चों से उनका
बचपन छिन लिया गया है
जाने या अनजाने
माँ बाप भी डरे सहमे रहने लगे हैं ,
कितना भी खुद मे
जोश भर लो
हिम्मत दिखा दो
पर अन्दर से सब डरे हुए ,
पर कब तक जियेंगे
हम और हमारे बच्चे
ऐसी ज़िन्दगी
आखिर कब तक ??
कैसे बदलेगा ये समाज
और लोगों नजरिया ??
रेवा
Wednesday, April 17, 2013
पारो की व्यथा
औरतें हर दिन जीती है ,हर दिन मरती है
रोज़ नयी लड़ाई लडती है ,पर फिर भी कहाँ कुछ बदलता है /
अगर मर्द कुछ करे तो ,उसकी माफ़ी सहज ही मिल जाती है
पर अगर वहीँ औरत ऐसी गलती करे तो वो अपराध , क्यों ?
बहुत प्यार करती थी पारो अपने पति से
तन मन धन से सेवा करती
पति ,घर और बच्चो की,
शारीर कभी साथ देता
कभी नहीं भी ,
फिर भी एक उफ़ तक नहीं करती थी
क्युकी उसे लगता था की उसका पति उससे
बहुत प्यार करता है ,
पर जब एक दिन सच जाना
आँखों से सब देखा
टूट गयी वो ,
आँखों से आंसू की जगह
लहू बहने लगे ,
पति से पुछा तो
समझा बुझा कर चुप करा दिया उसे ,
करती भी क्या ,
कहाँ जाती बच्चों का मुँह
देख कर चुप हो गयी ,
घुलती रही रोज़
टूटती रही रोज़ फिर भी जीती रही ,
न घर वालों ने बात जान कर कुछ कहा
न दोस्तों ने
बल्कि सब ने पारो को ही समझाया ,
पर प्रश्न ये है
अगर गलती पारो ने की होती तो
क्या तब
उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता ?
रेवा
रोज़ नयी लड़ाई लडती है ,पर फिर भी कहाँ कुछ बदलता है /
अगर मर्द कुछ करे तो ,उसकी माफ़ी सहज ही मिल जाती है
पर अगर वहीँ औरत ऐसी गलती करे तो वो अपराध , क्यों ?
बहुत प्यार करती थी पारो अपने पति से
तन मन धन से सेवा करती
पति ,घर और बच्चो की,
शारीर कभी साथ देता
कभी नहीं भी ,
फिर भी एक उफ़ तक नहीं करती थी
क्युकी उसे लगता था की उसका पति उससे
बहुत प्यार करता है ,
पर जब एक दिन सच जाना
आँखों से सब देखा
टूट गयी वो ,
आँखों से आंसू की जगह
लहू बहने लगे ,
पति से पुछा तो
समझा बुझा कर चुप करा दिया उसे ,
करती भी क्या ,
कहाँ जाती बच्चों का मुँह
देख कर चुप हो गयी ,
घुलती रही रोज़
टूटती रही रोज़ फिर भी जीती रही ,
न घर वालों ने बात जान कर कुछ कहा
न दोस्तों ने
बल्कि सब ने पारो को ही समझाया ,
पर प्रश्न ये है
अगर गलती पारो ने की होती तो
क्या तब
उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता ?
रेवा
Tuesday, April 16, 2013
Friday, April 12, 2013
आवाज़ की जादूगरी
इतनी व्यवस्तता और मुश्किलों
के बीच भी ,
आज चेहक उठी मैं
सारी परेशानियाँ
जैसे छु मंतर हो गयी हों ,
पूछा भी तो था आज तुमने ?
पर जानते नहीं
के ये बस तुम्हारी
आवाज़ की जादूगरी है ,
जो आज बहुत दिनों बाद
सुनने मिली थी ,
तमाम मुसीबतें एक तरफ
और तुमसे मिलने वाला
सुकून एक तरफ
सच है ,
प्यार हमे कितना कुछ देता है
बस उसे महसूस करने वाला दिल चाहिये /
रेवा
के बीच भी ,
आज चेहक उठी मैं
सारी परेशानियाँ
जैसे छु मंतर हो गयी हों ,
पूछा भी तो था आज तुमने ?
पर जानते नहीं
के ये बस तुम्हारी
आवाज़ की जादूगरी है ,
जो आज बहुत दिनों बाद
सुनने मिली थी ,
तमाम मुसीबतें एक तरफ
और तुमसे मिलने वाला
सुकून एक तरफ
सच है ,
प्यार हमे कितना कुछ देता है
बस उसे महसूस करने वाला दिल चाहिये /
रेवा
Saturday, March 30, 2013
जाने क्यूं
मेरे पास तेरी खुशबू तो नहीं
फिर भी जाने कैसे महक उठती हूँ मैं ,
आँसू तूने दिए नहीं
फिर भी जाने क्यूं आँखें छलक उठती हैं ,
प्यार तूने भुरपुर दिया
फिर भी जाने क्यूं तड़प उठती हूँ मैं ,
सारी बातें साँझा की तुमसे
फिर भी जाने क्यूं बातें अधुरी रह जाती है ,
हर वक़्त तू साथ है मेरे
फिर भी जाने क्यूं तन्हाई सताती है ,
हर लम्हा ज़िन्दगी को भरपूर जीने की कोशिश करती हूँ
फिर भी जाने क्यूं मौत आसां लगती है /
रेवा
फिर भी जाने कैसे महक उठती हूँ मैं ,
आँसू तूने दिए नहीं
फिर भी जाने क्यूं आँखें छलक उठती हैं ,
प्यार तूने भुरपुर दिया
फिर भी जाने क्यूं तड़प उठती हूँ मैं ,
सारी बातें साँझा की तुमसे
फिर भी जाने क्यूं बातें अधुरी रह जाती है ,
हर वक़्त तू साथ है मेरे
फिर भी जाने क्यूं तन्हाई सताती है ,
हर लम्हा ज़िन्दगी को भरपूर जीने की कोशिश करती हूँ
फिर भी जाने क्यूं मौत आसां लगती है /
रेवा
Monday, March 25, 2013
लड़कियों का अपना घर
क्या लड़कियों का कोई
अपना घर नहीं होता ?
बचपन से माँ यही सिखाती है
ये काम ऐसे कर
वो कम वैसे कर
वर्ना अपने घर जाएगी तो तुझे
ही दिक्कत होगी ,
भाई भी यही कह कर चिढाते हैं
"मैं तो हमेशा यही रहूँगा जाएगी तो तू" ,
जब ब्याह कर चली जाती है
तो उस घर को समझने मे
वहां के
लोगो को जानने मे
सालों लग जातें हैं ,
फिर भी सबको अपना नहीं
बना पाती ,
कहीं न कहीं उसे चीजों
से समझौता करना ही पड़ता है ,
कभी ज्यादा
कभी कम
क्युकी वो जानती है
उसके हाँथ मे और कुछ नहीं ,
कोई जगह है नहीं
जहाँ वो जा सके ,
बाबुल के आंगन मे भी तो यही सीख मिलती है
"उस घर मे डोली जा रही है
अर्थी भी वहीँ से निकलनी चाहिये "
ये बात शायद बरसों पुरानी लगे
पर आज का सच भी यही है ,
ब्याह के बाद मुसीबत आने पर भी
माँ बाप समझा बुझा कर भेज ही देते है ,
ज़माने के साथ बहुत कुछ बदला है
फिर भी ,
क्या लड़कियों का कोई अपना घर होता है ??

रेवा
अपना घर नहीं होता ?
बचपन से माँ यही सिखाती है
ये काम ऐसे कर
वो कम वैसे कर
वर्ना अपने घर जाएगी तो तुझे
ही दिक्कत होगी ,
भाई भी यही कह कर चिढाते हैं
"मैं तो हमेशा यही रहूँगा जाएगी तो तू" ,
जब ब्याह कर चली जाती है
तो उस घर को समझने मे
वहां के
लोगो को जानने मे
सालों लग जातें हैं ,
फिर भी सबको अपना नहीं
बना पाती ,
कहीं न कहीं उसे चीजों
से समझौता करना ही पड़ता है ,
कभी ज्यादा
कभी कम
क्युकी वो जानती है
उसके हाँथ मे और कुछ नहीं ,
कोई जगह है नहीं
जहाँ वो जा सके ,
बाबुल के आंगन मे भी तो यही सीख मिलती है
"उस घर मे डोली जा रही है
अर्थी भी वहीँ से निकलनी चाहिये "
ये बात शायद बरसों पुरानी लगे
पर आज का सच भी यही है ,
ब्याह के बाद मुसीबत आने पर भी
माँ बाप समझा बुझा कर भेज ही देते है ,
ज़माने के साथ बहुत कुछ बदला है
फिर भी ,
क्या लड़कियों का कोई अपना घर होता है ??
रेवा
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