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Thursday, January 30, 2014

इंतज़ार



इंतज़ार कि घड़ियाँ
गिनते - गिनते ,
प्रीत कि ओढ़नी ओढे
मन दुल्हन सा हो गया है ,
मिलन कि आस लिए
बस दरवाज़े पर
टक - टकी लगाये
पहरा देते रहते हैं
मेरे एहसास ,
अश्रु अब पलकों के
सीपों में बंद
मोती हो गयें हैं ,
जो बस पिया के
गले का हार
बनने को आतुर हैं ,
आह !ये इंतज़ार भी
कभी गुदगुदाता है
कभी रुलाता है,
पर कभी - कभी
जीवन को दुबारा
प्यार से भर देता है।

रेवा

Tuesday, January 28, 2014

मन कि भूख


होने को ये एक छोटा सा वाक्या है...............पर मैं
समझ नहीं पा रही हूँ , हंसु या रोऊँ। लोगों कि सोच सही है या मैं गलत ,
किसी ने पूछा मुझसे , कि क्या मैं कवितायेँ लिखती हूँ , मेरे हाँ
कहने पर उन्होंने बोला......... इस से तुम्हे  कितनी आमदनी होती है ?
मैं सकपका गयी .........समझ नहीं आया क्या जवाब दूँ,
उन्हें क्या बताऊ... कि मैं पेट कि भूख मिटने के लिए नहीं  बल्कि
अपने मन कि संतुष्टि अपने मन कि भूख मिटने के लिए लिखती हूँ।

रेवा


Friday, January 24, 2014

दिल कि फितरत




जब दिल रोता है तो
लाख कोशिशों के
बावजूद ,
पलकों के शामियाने
को छोड़
आँसू छलक जातें हैं ,
दिल को कितना भी
समझा लो
पर हर बात उसे
नागवार गुजरती है ,
और वो
अपने एहसासो से
भिगोती रहती है
पलकों को ,
"क्युकी खुद को समझाना
हमारी आदत है ,
पर न समझना
दिल कि फितरत है" ।


रेवा 

Tuesday, January 21, 2014

तड़पते एहसास


जीवन साथी जब दूर हो तो ,
कभी कभी मन को
समझाना आसां लगता है
पर खुद को समझाना
बहुत मुश्किल ,
हम सबको धोखा
दे सकते हैं
पर अपने आप को नहीं ,
दिन तो निकल जाता है
पर शाम होते ही ,
यादों के साये
घेर लेते हैं
आँखे बरबस 
भीग जाती है ,
बाहें आलिंगन को
तरसने लगती है ,
मन, दिल ,आत्मा
सब रुदन करने
लगते हैं ,
उस एक पल ऐसा
महसूस होता है
मानो
सारी दुनिया बेकार है ,
पर फिर भी
जीना पड़ता है ,
तड़पते एहसासों
के साथ।


रेवा 

Thursday, January 16, 2014

कोशिश




बहुत कोशिश की
तुझसे दुरी बनाने की
लेकिन हर कोशिश
नाकाम रही ,
लाख चाहा एक
औपचारिक रिश्ता
कायम करूँ  ,
पर जब भी तुम्हारी आवाज़ सुनी
सारे प्रयास बेमानी
लगने लगे ,
पता नहीं तुम्हारी
सखशियत ऐसी है
या तुम्हारा प्यार ऐसा है ?
शायद जब प्यार करना
अपने वश मे नहीं होता ,
तो दूर जाना भी
मुमकिन नहीं होता।

रेवा


Monday, January 6, 2014

क्या नाम दूँ ऐसे रिश्ते को ???




न कोई शिकवा है ,
न शिकायत
न नफ़रत है,
न मोहब्बत
न आशा है ,
न निराशा
न ख़ामोशी सुकूं देती है ,
न बातें
न आंसु दिल दुखाती हैं ,
न हंसी मन बहलाती है
न मिलन कि आस है ,
न जुदाई का गम
फिर भी जुड़े हैं एक दूजे से हम

क्या नाम दूँ ऐसे रिश्ते को ???

रेवा 

Friday, January 3, 2014

समय

ह्रदय और मन की
ये कैसी है संधि  ,
दोनों ने आपस मे 
कर ली है जुगलबंदी ,
समझ ने भी ऐलान 
कर दी है बंदी ,
आँखों ने ठान लिया है 
देगा उनका साथ ,
एहसासों ने भी 
मिलाया इनसे हाँथ ,
कोशिशे हो रही नाकाम 
लगता नहीं ये काम है आसान ,
मन तो होता रहेगा अधीर 
पर मुझे भी धरना होगा धीर ,
हालात कभी नहीं होते एक से 
हर समय होता है अस्थायी ,
बस यही बात अब 
मन मे आयी। 


रेवा