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Thursday, June 21, 2018

कविता



मैं रोज़
पढ़ती हूँ कविता
कई बार कुछ ऐसा पढ़ती हूँ
जो मन को झकझोर देता है,
द्रवित कर देता है
कई बार आक्रोश से
भर देता है
कभी कभी बेअसर भी
होती हैं कविताएं

लिखती भी हूँ हर रोज़
प्रेम, विरह
धरती, आकाश
समुद्र, नदी
भूख, गरीबी
सहनशक्ति और
न जाने क्या क्या
लेकिन सोचती  हूँ
क्या मेरी कविताएं
कुछ दे पाती है किसी को ???

क्या ये बेरोज़गार को रोज़गार
बेघर को घर
भूखे को रोटी 
प्यासे को पानी
न उम्मीदों को उम्मीद
मज़लूमों को इंसाफ 
विरहन को प्यार
दे पाती हैं ????

इनमें से  कुछ भी तो नहीं
दे पाती मेरी कविताएं
पर फिर भी मैं रोज़ आती हूँ
इनके पास
रोज़ पढ़ती हूँ
रोज़ लिखती  हूँ
क्योंकी प्यार है मुझे
कागज़ और कलम से
विशवास है मुझे
ये कविताएं कहीं किसी को
कुछ सुकून के पल तो दे ही पाती हैं
कहीं किसी का ज़मीर भी
जगा जातीं हैं 
किसी को सोचने पर मजबूर 
कर देती हैं 
और आने वाली नस्लों को
हमारे जीवन से मिलवाती हैं
इसलिए हे कवि/ कवियत्री
तुम ज़रूर लिखो कविताएं।


रेवा 


9 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अफीम सा नशा बन रहा है सोशल मीडिया “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (23-06-2018) को "करना ऐसा प्यार" (चर्चा अंक-3010) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. Replies
    1. शुक्रिया सदा जी

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