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Saturday, June 9, 2018

प्रकृति


जानते हो 
प्रकृति कभी बूढ़ी
नहीं होती
झुर्रियां नहीं आती चेहरे पर
अंग बेकार या शिथिल नहीं
होते इसके
साल दर साल बीतते जाते हैं
पीढ़ियाँ बदलती जातीं हैं
पर वो वैसी ही रहती है
लेकिन हम ठहरे मनुष्य
हमे दिमाग से नवाजा है
ख़ुदा ने
तो हर जगह दखलंदाज़ी
करना भी ज़रूरी है
हमने शुरू कर दी
प्रकृति से छेड़ छाड़
शुरू शुरू में तो एक आध
फोड़े फुंसी ही निकले
पर हमें समझ नहीं आया
जिसका नतीजा ये निकला की
धीरे धीरे
प्रकृति सच में बूढ़ी होने लगी
उसके अंग बीमार हो गए
नदियों का पानी सूख ने लगा
पेड़ो की जगह
कंक्रीट नज़र आने लगे
हवा में कारख़ानों का ज़हर
घुलने लगा
खाद् कीटनाशक और
प्लास्टिक की वजह से
मिट्टी ज़हरीली होने लगी
कहीं नहीं छोड़ा हमने प्रकृति को
अब हाल ये है की
वो दिन दूर नहीं जब
प्रकृति जर्जर होकर सच में
मर जाएगी !!

रेवा 

14 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-06-2018) को "गढ़ता रोज कुम्हार" (चर्चा अंक-2997) (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन चौधरी दिगम्बर सिंह और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. वाह! विचारशील प्रभावशाली रचना। बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  4. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 12/06/2018 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  5. सच कहा है अगर ही छेड़ प्राकृति से होती रही तो वक दिन ख़ामियाज़ा इंसान को बहुत महँगा पड़ने वाला है ...
    अच्छी रचना ...

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  6. वाह!!बहुत खूब !

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