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Saturday, December 8, 2018

अक्षर


कभी कभी जब 
मैं आत्मविश्लेषण करती हूँ
तो स्वतः ही
एक सवाल मन में 
उठता है

मैं क्यों कविताएं लिखती हूँ
क्यों हर रोज़ लगता है
कुछ न कुछ लिखना है ही ?
क्या सिर्फ वाह वाही के लिए
या समाज के लिए
या बस यूँ ही
या ख़ुद के लिए लिखती हूँ ?

जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं
लगता है मैं खुद की तलाश में हूँ
प्यार की तलाश में हूँ
जीवन की खोज में हूँ
इसलिए अक्षरों की 
शरण में आई हूँ
उनसे पक्की दोस्ती कर
जीना चाहती हूँ
जानना चाहती हूँ
समझना चाहती हूँ 

वो जो स्पष्ट नहीं
वो जो है तो मुझ में
पर मिलता नहीं मुझे 
इसिलए अभी सफ़र में हूँ
अ से ज्ञ तक की 
यात्रा जो करनी है .... 

#रेवा

8 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना

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  2. बिल्कुल सही कहा आपने रेवा जी।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (10-12-2018) को "उभरेगी नई तस्वीर " (चर्चा अंक-3181) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  4. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 11/12/2018
    को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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