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Tuesday, October 25, 2011

कभी चखा है ?

कभी चखा है 
प्यार मे बहते 
आँसुओं का स्वाद ? 

जितने मीठे होते हैं 
उतना ही भर देते हैं 
प्यार से ,

कभी देखा है 
प्यार से भरे 
आँखों को ?

बला की ख़ूबसूरत 
हो जाती हैं आँखें ,
जुबान की जरूरत 
ही नहीं होती फिर ,
बस आँखें ही 
बयां कर देतीं 
है हाले दिल ,

शुक्रिया तुम्हारा 
ए साथी ...
की तुमने मुझे 
जीवन के इस रस से महरूम 
नहीं होने दिया .........

"छलकने दो इन आँसुओं को 
भरने दो नैनों के प्यालों को ,
क्यूंकि एक एक आंसू
मेरे प्यार की इन्तहा 
को बयां  करते हैं "

रेवा 


Friday, September 30, 2011

मन की व्यथा

कभी कभी 
मन मे विचार 
तो बहुत सारे
आते हैं ,
पर न उँगलियाँ 
न शब्द साथ 
देते हैं ,
लगता है
शब्दों की कमी
हो गयी है ,
या फिर ये 
उँगलियाँ लिख 
ही नहीं पा रही ,
या फिर मन 
जिस तेज़ी से 
दौड़ रहा है ,
जितना कुछ 
सोच  रहा है ,
उन सबको 
शब्दों मे 
ढाल पाना 
बहुत मुश्किल है ,

"बार बार लिखना चाहा ,
 जानना चाहा खुद को 
 पर न ही लिख पाई 
 न ही समझ पाई खुद को 
 मन की व्यथा 
 मन मे ही दबा कर 
 बस जलाती रही खुद को "

रेवा 


Friday, September 23, 2011

तारे

पिछले कुछ दिनों मे
आकाश मे टिमटिमाते 
तारों की भाषा पढ़ने
की कोशिश की,
तो पाया की ये 
हमे कितना कुछ 
सीखाते हैं रिश्तों
के बारे मे,
कितने अनगिनत 
तारे एक साथ 
रहते हैं 
उस नीले असमान पर
बिना लड़े झगडे ,
बस टिमटिमाते 
रहते हैं /
दो प्रेमियों की तरह 
एक दुसरे से 
प्यार करते ,
एक दुसरे को सदा 
देखते रहते हैं,
पर कभी एक दुसरे 
से मिल नहीं पाते,
न कभी इसकी 
शिकायत ही 
करते हैं किसी से,
बस 
प्यार करते रहते हैं ,
ध्यान से देखो उन्हें 
और जीवन को 
प्यार से जगमगाते 
रहो ...........

रेवा 


Tuesday, September 6, 2011

दिल की डायरी मे

इन तीन सालों मे
बहुत कुछ पाया 
है तुमसे ,
दोस्ती ,विश्वाश
अपनापन ,ख्याल ,
इसी मे डूब कर 
सब कुछ भूल 
गयी थी मै ,
यहाँ तक की 
अपनी डायरी भी ,
सबकुछ तुमसे 
जो बाँट लिया 
करती थी ,
पर अब लगता है 
तुम्हारे पास 
मेरे लिए समय नहीं ,
या तुम्हारी जिम्मेदारियाँ
बढ़ गयी है /
जो भी है ,
बहुत अकेला कर
दिया है तुमने मुझे 
शायद तुम 
मेरा दर्द कभी 
न समझ पाओ ,
क्युकी तुम इस 
कदर मसरूफ हो 
की तुम्हे एहसास 
ही नहीं, 
इस तकलीफ का ,
पर मेरी डायरी
कभी इतना मसरूफ
नहीं होगी ,
वो आज भी
मेरा इंतज़ार 
वैसे ही कर
रही है ,
जो भी हो ,
तुम्हारे साथ 
बिताया हर लम्हा , 
संजो कर रखूंगी 
इस दिल की 
डायरी मे l 

रेवा 




Friday, September 2, 2011

एक प्रशन ?

एक प्रशन है 
जो मुझे बार-बार 
सताता है ,
क्या रिश्ते 
फूलों की तरह 
होते हैं ?
खिलते हैं
कुछ समय 
के लिए ,
फिर मुरझा 
जाते हैं /
चाहे जितना भी 
खाद , पानी डालो 
पर वो हमेशा 
खिले नहीं रह सकते ?




रेवा 




Saturday, August 27, 2011

स्त्री की विडम्बना ....

कभी जब ढूंढने 
निकलती हूँ खुद को ,
को तो पाती हूँ
अपने अन्दर 
एक मौन एक
एकाकीपन ,
एक लड़की जो
रोज़ खुद से 
लडती  रहती है ,
कभी इस एकाकीपन को
दूर करने के लिए
जुड़ जाती है
लोगों से,
नए रिश्ते बनाती
और उन से आशाएं 
करने लगती है,
हर बार टूटता
है ये भ्रम ,
पर नहीं सुधरती /
 कभी कुछ पाने की 
आशा मे,
कुछ कर गुजरने 
की चाहत मे ,
तड़पती रहती ,
पर अपने परिवार 
की जरूरतों के
आगे कुछ जरूरी 
नहीं लगता ,
या यु हो सकता 
है की ये बहाना 
हो ,कुछ न                                           
कर पाने का ,
शायद 
खुद से जुड़ना ,
खुद को जवाब 
देना , खुद से
प्यार करना ,
नहीं सीख 
पाई ..................

रेवा


Thursday, August 11, 2011

क्या ज़िन्दगी ऐसी होती है?

कितनी शिद्दत से 
चाहा था मैंने ,
के कभी तुम प्यार से
हमारे पास बैठो ,
कुछ अपने दिल 
की बातें कहो ,
कुछ मेरी सुनो
शिकवा शिकायत
ही सही .....
कुछ ऐसे पल 
तो हो ,
जो बस हमारे
तुम्हारे हों \
ज़िन्दगी की भाग 
दौड़ जरूरी है ,
पर इतनी भी नहीं 
की ,उसे समय 
ही न दो
जिसे उसकी सबसे 
ज्यादा जरूरत हों \
कुछ समय दिया भी 
तो बस उलाहने और 
ज़िम्मेदारियाँ निभाने 
के सलाह के नाम ,
क्या ज़िन्दगी
ऐसी होती है ?
क्या दिल ,जज्बात 
ख्याल नाम की
कोई चीज़ नहीं होती ?
जब मन ही खुश न हो 
तो  ज़िन्दगी के ताने 
बाने सुलझाने मुश्किल 
हो जाते हैं /
यह बात मै कभी 
समझा न पाई ,
न कभी तुमने 
समझने की कोशिश 
ही की......
अपने दिल का प्यार 
शायद तुम तक 
पहुचाने मे असमर्थ रही ,
या तुम्हारे दिल मे
प्यार नामक चीज़ की
कोई अहमियत ही नहीं /
जो भी हो
अब तो बस लगता 
है की
जिस बंधन मे
बांध दिया है
भागवान ने ,
उसे निभाने का
नाम ही ज़िन्दगी है............

रेवा