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Monday, July 6, 2015

गोल रोटी



रोटी को गोल
बनाते बनाते
मेरी ज़िन्दगी भी जैसे
गोल हो गयी है………

हांथों मे बचा हैं तो बस
इधर उधर चिपका
गीला आटा.……

बेमतलब बेमानी रिश्तों की तरह
जिसे धो कर साफ़
करना है.…

फिर भरना जो है
रिश्तों की ऊष्मा से
और ये क्रम यूँही
चलता रहेगा
उसी गोल रोटी की तरह…

रेवा






Saturday, June 27, 2015

दुर्गा का अपमान


घुन लग गयी है
लोगो की सोच मे ,
दिमाग खाली हो गया है
गुरू शिष्य की गरिमा को
ताक पर रख दिया है ,
इसे भी जोड़ दिया है
देह की लालसा से ,
सरस्वती को पा कर अभिमान
से भर गए हैं या
गिर गए हैं ,
तभी तो दुर्गा का अपमान
करने की हिम्मत आई ,
अब दुर्गा को ही फिर से
रोद्र रूप धरना होगा ,
ताकी नाश कर सके इन
मुखौटों के पीछे छिपे
महिसासुरों का.............

रेवा


Saturday, June 20, 2015

मैं गृहणी हूँ





आज मान लिया मैंने की
सारी गलती मेरी ,
अगर बच्चे पढ़े न
बड़ों को जवाब दें तो
गलती मेरी ,
आखिर मैं ही तो रहती हूँ
दिन भर उनके साथ ,
अगर घर बजट
गड़बड़ हुआ तो
गलती मेरी ,
मैंने ही की होगी फिजुलखर्ची ,
सेहत ख़राब हो तो
गलती मेरी
ध्यान नहीं देती पौष्टिकता पर ,
आखिर मैं गृहणी हूँ !
बात मेरी चाहे
अनसुनी की जाती हो
पर जो भी होता है
उसमे मेरी रजामंदी
मान ली जाती है ,
और अगर गलत हुआ तो
गलती मेरी
क्योंकी मैं गृहणी हूँ................


रेवा

Thursday, June 11, 2015

निष्प्राण कलम


मेरे मन की गठरी से
निकल कर खो गयें है
सारे शब्द ,
ख्याल सिमट गए हैं
दिल की चार दिवारी के बीच ,
एहसास कहीं गुम हो गयें हैं
समय भी दब गया हैं
काम के बोझ तले ,
अब कैसे करूँ तुकबन्दी ?
कैसे भरूं
अपनी रचनाओं मे प्राण
जब मेरी कलम पड़ी है
निष्प्राण………………

रेवा


Tuesday, May 12, 2015

नारी




नारी

माँ बहन बेटी पत्नी दोस्त
और भी कई रूप
पर दिखता क्यों बस
हाड़ मास का देह स्वरुप ,
प्यार वात्सल्य से भरी
इस मूरत मे
क्यों दीखता है
काम ,वासना का ही रूप ,
बोलने को कर लेते हैं सब
बड़ी बड़ी बातें
और बनते हैं परम पुरुष,
पर मन के अंदर
वहीँ लालसा ,वो ही
लपलपाती लार टपकती
इच्छायें लिए घूमते हैं ,
इंतज़ार मे की कब मौका
मिले और भूख शांत हो ..........
"अगर ये दुनिया ऐसी है
तो हमे दुगनी शक्ति से
भर दो माँ
ताकी आने वाली बेटियों को
हम सब मिल कर 
भय मुक्त समाज दे सके !!


रेवा



Monday, May 11, 2015

मुनिया (लघु कथा )



सोमारी झारखण्ड मे रहने वाली एक आम औरत……पिछले ३ महीनो से लड़ाई लड़ रही थी।अपनी बच्ची को स्कूल मे पढ़ाना चाहती थी , घर वालों की और पति की मनाही के बावजूद , अपने समुदाय से लड़ कर उसने अपनी मुनिया का दाखिला स्कूल मे करवा दिया.... ताकि वो पढ़ सके और उसकी तरह बिना पढ़े जमीन के कागज़ पर अंगूठा लगा कर सारी ज़िन्दगी एक बंधवा मजदुर न बन जाये।
आज मुनिया को गोद मे लिए लालटेन की रौशनी मे भी उसे मुनिया के उज्जवल भविष्य का चढ़ता सूरज नज़र आ रहा था।

रेवा 

Tuesday, May 5, 2015

बेमानी



ज़ुबान पर नाम तो तेरा अब भी आता है
पर जाने क्यूँ ये लब खामोश रहते हैं ,

प्यार तो तुझ पर अब भी आता है
पर जाने क्यूँ ये दिल बेवफाई की चादर ओढ़ लेता है ,

ख्वाबों में तेरा अक्स अब भी नज़र आता है
पर जाने क्यूँ ये नज़रों का धोखा लगता है ,

आदत सी हो गयी है यूँ जज़्बातों को कुचलने की
जाने क्यूँ ये प्यार अब बेमानी सा लगता है।

रेवा