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Monday, September 10, 2018

मक़बरा


वो जीता है सालों से 
उसकी तस्वीरों
उसके ख्यालों और
अपने रंगों के साथ 

उसके लिए 
वो अभी भी इस 
दुनिया का हिस्सा है 

उसकी अलमारी 
उसकी किताबें 
उसकी तस्वीर 
सब जिंदा है 

वो दीवारों से भी 
उसकी बातें 
कर लिया करता है 

कमरे में अब भी 
उसकी खुश्बू 
मौज़ूद है
जो उसे रूहे सुखन
देती है 

वो घर उसकी यादों
का मक़बरा नहीं है 
जैसा की लोग 
कहते हैं
बल्कि उन दोनों
के प्यार का घोंसला है ....

#रेवा 
#इमरोज़ 
##अमृता के बाद की नज़्म 

10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (11-09-2018) को "काश आज तुम होते कृष्ण" (चर्चा अंक-3084) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन पं. गोविंद बल्लभ पंत और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. बहुत कसक भरी, बहुत टीस भरी कविता ! अमृता प्रीतम और इमरोज़ की प्रेमकथा वाक़ई सदियों तक याद की जाएगी. वह किसी मक़बरे में क़ैद नहीं हो सकती, वह तो हर आशिक़ के दिल में हमेशा ज़िन्दा रहेगी.

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