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Friday, September 7, 2018

देह की नौका



मैं अपनी देह को
बना कर नौका
जीवन रूपी
इस समुद्र को पार
करती हूँ
रास्ते में
आये तूफान को
झेलते हुए
लहरों के थपेड़ों से जूझती
और मजबूत बन जाती हूँ
कई बार
लपलपाती जीभ लिए
मगरमच्छों से भी
सामना हो जाता है मेरा
पर मैं टूटती नहीं हूँ
हारती नहीं हूँ
लड़ती हूं
लहूलहान करती हूँ
मारती हूं
और आगे बढ़ जाती हूँ
बीच में कई घाट भी आते हैं
जिनपर मैं ठहरती हूँ
विश्राम करती हूँ
और फिर निकल पड़ती हूँ
अपने लक्ष्य की ओर
लक्ष्य है
इस जीवन को जीना
और फिर
माटी में मिल जाना
जिस दिन उस माटी का
दीपक बन जलूँगी मैं
अपने उस कान्हा के सामने
समझ लूंगी मैं
मेरा जीवन सार्थक हुआ
सार्थक हुआ।
#रेवा
#देह

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (08-09-2018) को "मँहगाई पर कोई नहीं लगाम" (चर्चा अंक-3088) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेई जी को नमन और श्रद्धांजलि।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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