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Thursday, August 2, 2018

पुल (२)


औरत अक्सर पुल होती है
अपने बचपन के घर और
अपने शादी के बाद के घर के बीच

अपनी मायके की मान्यताओं
और ससुराल की मान्यताओं के बीच

औरत अक्सर पुल होती हैं
अपनी आकाँक्षाओं और
अपने द्वारा किये समझौते के बीच

अपने लिए सम्मान की चाह
और ख़ुद को मिले अपमान के बीच

औरत अक्सर पुल होती है
अपनी ख़ुद की जकड़ी हुई सोच
और अपने बच्चों की सोच के बीच

अपनी तबियत और
घर के रोज़मर्रा के काम के बीच

औरत अक्सर पुल होती है
प्यार की चाह और 
एहसासों के तड़प के बीच

औरत पुल ही नहीं दहलीज़ होती है 
अंदर और बाहर की दुनिया के बीच......

#रेवा
#औरत


14 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (04-08-2018) को "रोटियाँ हैं खाने और खिलाने की नहीं हैं" (चर्चा अंक-3053) (चर्चा अंक-2968) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Sanjay Sachdeva LucknowAugust 3, 2018 at 9:17 AM

    औरत ही है जो पुल होती है दो घरों के बीच ...
    मायके की चहक और ससुराल की महक...
    बचपन की यादें और सपने पलते है मायके में..
    और पूरा करने की जद्दोजहद होती है ससुराल में ....

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    1. सच कहा आपने....शुक्रिया

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  3. Replies
    1. शुक्रिया लोकेश जी

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  4. औरत अक्सर पुल होती है
    प्यार की चाह और
    एहसासों के तड़प के बीच
    औरत दहलीज़ होती है
    अंदर और बाहर की दुनिया के बीच......
    सोचने को विवश करती आपकी यह रचना मुझे प्रभावित कर गई। शुभकामनाएं।

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    Replies
    1. मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है ....रचना को यही तो काम है ....बहुत शुक्रिया

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  5. औरत अक्सर पुल होती है
    प्यार की चाह और
    एहसासों के तड़प के बीच बेहद खूबसूरत रचना

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