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Thursday, August 9, 2018

आकाश की तड़प



आकाश की तड़प
आज समझ आई ...

जब आसमान
तड़पता है
प्यार के लिए
तो धड़कने
बढ़ जाती हैं उसकी
और वो बादल बन
गरजने लगता है
सांसें तेज़ हवाओं सी
चलने लगती हैं
दिल की टीस
बिजली बन
कड़कने लगती है
पर जब उसकी ये
पुकार भी
कोई नहीं सुनता
तो आँसू बन कर
बरस पड़ते हैं ये बादल।

रेवा



6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (11-08-2018) को "धार्मिक आस्था के नाम पर अराजकता" (चर्चा अंक-3060) (चर्चा अंक-2968) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नौ दशक पूर्व का काकोरी काण्ड और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. Sanjay Sachdeva LucknowAugust 10, 2018 at 9:02 PM

    बेहतरीन.....

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